अनगढ़ हीरा “भिखारी ठाकुर”

हंसि हंसि पनवा खीऔले बेईमनवा कि अपना बसे रे परदेस।

कोरी रे चुनरिया में दगिया लगाई गइले, मारी रे करेजवा में ठेस!

विदेशिया फिलिम के ई गाना जब भी सुनाई देले , दिल में एक अलगे अनुभव होखे ला। भोजपुरी लोक संगीत के आत्मा एईसने गीतन में बसे ला। ई गीत आ एईसने बहुते गीत के रचयिता “भिखारी ठाकुर ” के भोजपुरी साहित्य के “शेक्सपियर” कहल जाला।

भिखारी ठाकुर बहुआयामी प्रतिभा के धनी रहलन। उ एगो लोक कलाकार के साथ कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य निर्देशक, लोक संगीतकार आऊर अभिनेता भी रहनी। उनकर प्रतिभा के कायल राहुल सांकृत्यायन भी उनका के ‘अनगढ़ हीरा’ कहले रहनी।

भिखारी ठाकुर

भोजपुरी के नाटक ‘बेटी बेचवा’, ‘गबर घिचोर’ आज भी प्रचलित

उनकर निर्देशन में भोजपुरी के नाटक ‘बेटी बेचवा’, ‘गबर घिचोर’, ‘बेटी वियोग’ के आज भी भोजपुरी अंचल में मंचन होत रहेला । इन नाटकन अाऊर फिल्मन के जरिए भिखारी ठाकुर सामाजिक सुधार की दिशा में जबरदस्त योगदान कैलन।

मूल रूप से “बिदेसिया” एक ठो अइसन आदमी जे कलकत्ता कमाए गइल (आ बिदेसी हो गइल) के मेहरारू धनिया के वियोग आ एक ठो बटोही से अपना पति के लवट आवे के अरज करत सनेसा के कहानी हवे।

जवन घड़ी भिखारी रहन ओह घड़ी गँवई समाज ना जाने कय गो सामाजिक कुरिती से जकड़ल रहे।भिखारी ठाकुर पढल-लिखल ना रहन।तब्बो समाज के बुराई सभ के आपन लिखाई मे उठवलन ।

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