” ई बचपन कबो ना आई “

साभार : https://www.newstracklive.com/uploads/taja-khabar/news-track-special/Apr/13/big_thumb/game_570e1ee1714b0.jpg

माफी दीं तनी कुछ मनबढ़ई के कारन ब्लॉग ना लिखात रहल हा लेकिन अब हर हफ्ता नियत समय प रउवा सब हमनी के ब्लॉग पढ़ पाइम। हर मंगलवार के रात के 11 बजे। आज राउवे सभे पढ़ी हमनी के जियल बचपन के सशब्द झाँकी, आज के जमाना में इतना द्वेष, दुर्भाव, नफ़रत फईल गइल बा कि अब तनको उम्मीद नइखे की जवन बचपन 90’s भा 2000’s वाला लोग जियल बा उ फेर कबो केहू जीही। एह कविता के लिखे वाला विकास पाण्डेय के बहुत-बहुत धन्यवाद जे हमनी के सोझा एतना सुन्दर रचना के प्रस्तुत कइलन?

समय बीतत बा, बीतल जाई
लौट के बचपन,कबो ना आई!
बचपन में खेलनीसन खेला
देखनीसन ददरी के मेला
‘अईगा-विजे’ रोजे होखे
छप्पन भोग रहे लिट्ठी-चोखे
घर जस रहे तब पूरा गांव
खाली बता द बाबूजी के नाव
आँख लगे तब अपना घर में
आँख खुले तब अनका घर में
प्यार उ हमसे लिखल ना जाई
जवन रहे तब के नर-नर में!
खेत खलिहान,हरियर जुबान
कान्ह पर गमछा रहे आपन पहचान!

जब से बाहरा आईल बानी
गांव आ घर से पराईल बानी
स्वच्छंद जीवन पर लगल रोक बा
शहर मे मातम अउर शोक बा
नईखे छाँव की हम सुत जाई
नईखे पोखरा, खूब नहायी
‘अईगा-विजे’ कबो ना आई
कार्ड प सीधे नाम छपाई
ना फागुन मे फगुआ बा,
ना चईत मे चइता
अस्सी बरिश के बुढ़वो,
अभी एहिजा बा लइका
अपने काम मे सभे मस्त बा
अपने मे सभ व्यस्त
हम भईनी गँवई लईका
हो गईनी एहिजा पस्त
कहे “विकास” सम्हरी के चलऽ
हमरे ई परकार हऽ
नवकी माटी, नया जमाना
के इहे संस्कार हऽ
फैशन के एह दौर मे भईया
गइनी हम पगलाई

अब बस सोचत बानी की
जल्दी घरे चली जाई !

विकास पाण्डेय समकालीन मुद्दा प आपन विचार रखत रहेलन इनकरा के रउवा फेसबुक प फॉलो करsसकत बानी : https://www.facebook.com/vp254672

धन्यवाद?

Kundan Chaudhary

हमार छोटा प्रयास बा भोजपुरी खातिर कुछ कर सकी... भोजपुरी हमार माई भाखा ह, भा माई हमरा सबसे प्यारी बाड़ी। हम सिवान के आन्दर से बानी अभी हम दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ी मल महाविद्यालय के छात्र बानी।

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