“घर से दूर, घर में”

Central Hindu Boys School Hostel
       ब्लॉग के टाइटल अजीब बा नु, "घर से दूर घर में"? टाइटल के माने पूरा ब्लॉग पढ़ला के बाद मालूम चली... भा जे भी घर से दूर रहेsला उ हमरा जगह पर अपना-आप के महसूस करीं। त चली पढ़ल जाव...।
       गाँव में जवन भी लइका रहे लsसन ओकनी के पढ़े खातिर घर से बाहर जाहि के पड़ेला...। अगर लइका पढ़े के चाहता त ओके घर के लोग पढ़ावे खातिर... अपना से दूर जरूर भेजेsला। भा अगर पढ़े खातिर पलायन ना भी कइलस त कमाए खातिर त करहि के पड़ी काहे की बिहार भा उत्तर प्रदेश से पलायन ना होखे त देश रुक जाइ। एहिजा के लोग चलता त देश चलता।
       चली हमनी के विषय प आवे के त आज के विषय हॉस्टलर्स खातिर बा। हमनी के जब तक गाँव में रहनीsजा, लागे की दुनिया इहे ह... माने मेंढ़क वाला हाल. बाकी जसहि घर छूटल- मय तारा दिन में गिना गइल। कहाँ रहल जाइ, का कइल जाइ, कैसे कइल जाइ। घरे रहला प ई सब सवाल के जवाब माई-पापा के लगे रहे। बाकी जसहि शहर में अइनी सब सवाल के जवाब खुद-ब-खुद मिले लागल।
       नौकरी करे वाला के त ऑफिस ही घर हो जाला... लेकिन पढ़े वाला लइकाsसन के घर, घर से हमरा मतलब का शहर में रहे के ठिकाना... ह उहे 6 बाई 8 वाला, माचिस के डिब्बा- होस्टल के कमरा होला। हम बहुत खुशनसीब बानी जेकरा घर से बाहर निकलते ही सरकारी होस्टल मिल गइल- माने सस्ता, रोज मिले खाना में पास्ता। होस्टल सरकारी होखे या प्राइवेट जवन मेमोरी क्रिएट होला उ जिनगी भर खातिर होला। होस्टल में दोस्त के बर्थडे, होली, परीक्षा के एक दिन पहिले वाला रात भा और भी लाखों काण्ड।
       इंहा रहला के मतलब आज़ादी जवन जब मन तब वार्डन या गार्ड द्वारा छीनल जा सकेला। ह सही कहतानी... स्कूल होस्टल में इ होला। आज़ाद बानी पिंजरा के अन्दर। लेकिन जवन परिवार बनेsला, उ अटूट रहेsला। होस्टल में रह के स्कूल ना जाईल, भा ओकरा बाद प्रिंसीपल चेकिंग में पकड़ा मुँह लटका लेला के अलग ही मज़ा होला। हमरा सौभाग्य बा की हम दु बार जानबुझ के पढ़े ना गइनी भा प्रिंसिपल आके बहुत प्रेम से नाम ले के गइली। उ अलग बात बा की कवनो एक्सशन ना भइल।
       होस्टल लाइफ प लिखे के बहुत कुछ बा... का लिखी हमरा समझ नइखे आवत। जब हम होस्टल जॉइन कईनी त इहे लागल की अब सब कुछ से आज़ाद पंछी बानी। लेकिन होस्टल जॉइन के अगला दिन ही हम एतना गृहातुर भइनी की पापा खुशी-खुशी घरे बुला लेनी। बचपन में आपन माँग पूरा करे खातिर रोवला के बाद हम होस्टल में रहते हुए जब छठ के गाना सुननी त आँसू रुक ना पाइल भा हम रो देले रहनी। लोग कहेsला लइका ना रोवेलसन?।
       लेकिन जसहि सब लइका सन से जानपहचान भइल, ओकरा बाद कब घर के याद धूमिल होखे लागल मालूम ना चलल। आज ई स्थिति बा की घरे रह त होस्टल जाये के मन ना करेsला... आ होस्टल रहsत... घर के कमी महसूस ना होला। होस्टल में कइल हुडदंगई बहुत याद रही। वार्डेन भा गॉर्ड के नामकरण जवन हमनी के कईनीsजा बहुत याद रही। आज एगो होस्टल छूटलsहा, बाकी अभी होस्टल वाला जिनगी खत्म नइखे भइल।
       आखरी लाइन बा-
       एक मुद्दत बाद आजादी मिली कैद से,
       पर जब आज़ादी मिली कमबख्त पिंजरे से ही प्यार हो गया था।

Kundan Chaudhary

हमार छोटा प्रयास बा भोजपुरी खातिर कुछ कर सकी... भोजपुरी हमार माई भाखा ह, भा माई हमरा सबसे प्यारी बाड़ी। हम सिवान के आन्दर से बानी अभी हम दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ी मल महाविद्यालय के छात्र बानी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Pin It on Pinterest