पुरनका याद!!!

           जब आदमी ज्यादा भाग-दौड़ भरल जिन्दगी से घिर जाला, त ओकरा अंदर से इच्छा होला कि तनीका आराम कर लेवे के। थोड़ा सुस्ता जाए के फिर, दोबारा नया जोश से जिन्दगी के शुरुआत कइल जाए। एह बात के हम भी पूरा-पूरा महसूस करेsनी। हमरा जब दिल्ली जइसन शहर में तनाव ज्यादा महसूस होला/ भाग-दौड़ ज्यादा बढ़ जाला। त हमके दिल्ली शहरिया बड़ा काटेsला। एह से बचे खातिर हम दोस्तन से/करीबी लोग से मिले खातिर बेचैन हो जानी। अगर ई भी ना होला त दिल्ली शहर से ही दूर होखे खातिर तड़प जानी।
           एह बार भी कुछ अइसन ही भइल हा। हम परीक्षा ख़तम भइला के बाद सोचनी की दिल्ली रुक के ही कुछ उपन्यास भा अपना विषय से हट के कुछ पढ़ लीं। लेकिन दिल्ली त खुद एह समय जलत रहे, हमरा मन के कैसे ठंडा रखित। ई सब के कारण हम उकता के आखिरकार घरे जाए के फैसला कर ही लेनी। लेकिन ई e
एतना आसान ना रहे। यूनिवर्सिटी में हमार एगो दीदी भी पढ़ेली- गायत्री यादव। इनका घरे जाए के रहे, बनारस तक के टिकट रहे। पूरा हॉस्टल पहिले ही साफ हो गइल रहे अब इहो जाते रहली। अब हमरा हॉस्टल में रहला के मतलब रहे मुर्दा बन के रहीं। एह से ई सब से बचे खातिर गायत्री दीदी के संघे हमू बनारस आ गइनी।
           हम पहिले ही सोच के आइल रहनी कि हम बनारस में 2 दिन रुकेम और फिर घर चल जाएम। घरे लौटे के दिन ट्रैन छुटला से एक दिन ज्यादा ही रुके के मौका मिलल। हर शहर के आपन मिज़ाज़ भा अंदाज़ होला। नवाबी लखनवी, बिंदास कनपुरिया और भी बहुत तरह के शहर और उ सबके यूनिक अंदाज बा। बनारस शहर भी कम ना ह। हम शहर उच्चारित कर के कहीं ना कहीं बनारस के शान में कमी कर रहल बानी। बनारस शहर ना, जिन्दा इंसान ह। व्यक्तित्व अइसन की देखते सखा/संबंधी जइसन लगाव हो जाला। फिर हमरा जइसन हर आदमी चाहे ला कि कहीं से आई एक हाली बनारस घूम ही लीं। बनारस गुरु ह मरदे। ज्ञान हर कोना में मिल जाइ... गलती से कहीं ट्रैफिक में तेजी से निsकलs, चट रिक्शा वाला भी पूछ दी कि "का गुरु हेलीकॉप्टर माँगा दीं का?" ई त ई टेम्पू वाला तोहरा के ज्ञान देत रही भा टेम्पू हेलीकॉप्टर के रफ़्तार से एने-ओने चलावत रही घुसावत रही। बनारस के खूबसूरती इहे ह कि कितना ही दिन के बाद आई कुछ बदलsल ना लागे ला। ई शहर प्राचीन समय से ही ठेठ रहल होइ, गाली के अमृत तरह रसपान कइल जात रहल होइ, ज्ञान देवे के त एकर पूरा इतिहास रहल बा। आ ई आज भी अनवरत बाटे। अगर हमार बात अतिश्योक्ति लागत बा, त एक बार बनारस अच्छा से घूमी फिर मुहल्ला अस्सी फ़िल्म या काशी के अस्सी किताब पढ़ लीं।
           बनारस से घर रात वाला ट्रैन से अइनी। घर आ के एगो अलग तरह के सुकून मिलेsला। मय पुरनका दोस्त/यार से मुलाकात होला। ओ स्थान से मुलाकात होला जहाँ हमनी के केतना कुल किरिया-करम, हबड़ो-डबड़ो कइले बानी जा। ई सब के कारण कभी लात खइले बानी जा त कभी शाबासी भी मिलल बा। ई बार पता ना हमरा आँख के का हो गइल रहल ह। हर चीज़ के तुलना से देखत रहल हा। घर उहे, जवना खातिर बचपन में भाव आवे के छोड़ के कहीं भाग जाइ, लेकिन आज जब घर में आवेनी तबे चैन मिलेsला। पहिले जब खेल-कूद के घरे आई त बहरे से आवाज करत आई "माई रे-माई रे"। आ अब जब हम घर में आवेनी त समझदार लइका जइसन बनेsनी। अब माई रे-माई रे हम ना चिल्लानी लेकिन माई जरूर कहेsले कि बाबू आ गइल। अभी प्रखण्ड मुख्यालय के मैदान में जब जानी त कुछ समझ में ना आवेला कि कहाँ आ गइल बानी। जेतना लइका बाड़सन छोटका जवन खेलेsलसन क्रिकेट। हम कवनो के जानत नइखी एहि से उ पूरा मैदान अपना से जुड़ल ना लागे ला। जबकि ज्यादा समय के बात ना होइ। इहे मैदान 5-10 साल पहिले लागे कि आपन जागीर ह। कहीं कोड़ के कुछ भी बनावे लागी। कहीं हरा खास के कोड़ पिच बना दीं, त कहीं दोसरा जगह से माटी लिया के पिच बना दींsजा। कवनो रोक-टोक ही ना रहे। आज ई सब देख के बचपन याद आ जाला, उ हर दिन याद आ जाला कि कइसे हम हर बार चप्पल भुलवा दीं, एगो डोम दोस्त के संघे दिनभर बिता दीं। फिर घरे आ के लात खाई कि 'तू डोम के संघे घूमsबे, त डोम के घरे ही जो।' हमार घर बाजार से ज्यादा दूर नइखे। हमरा उ पप्पू लिट्टी के दुकान याद आवेला, जहाँ आपन भौकाल रहे कि जा के कुछ बतावे के ना पड़े। बस बेंच पर बैठत उधर से गरमा-गरम चार लिट्टी तुरन्त आ जावे। काहे कि हम पापा के जेब से पईसा चोरा के इतना लिट्टी खाई कि दुकानदार के आदत हो गइल रहे कि बाबू घर के नास्ता ना कर के हमरा दुकान के ही लिट्टी खाई। वैसे पढ़ाई में बचपन से ही सामान्य रहल बानी। 'अलका स्पोर्ट्स' भले दुकान के नाम में स्पोर्ट जुड़ल बा। लेकिन ई स्पोर्ट के दुकान कम और किताब-कॉपी के दुकान ज्यादा रहे। मय स्कूल के किताब एहि जा मिले। नया सेशन शुरू होत कह की चुल्ल मच जाए पापा के अलका स्पोर्ट्स ले जा के अपना खातिर एकदम नया-नया किताब-कॉपी खरदवाये खातिर।
           नइखे पता काहे, लेकिन हमरा बहुत दिलचस्पी रहे कुछ भी बनत देखे में। कभी बढ़ई के दुकान पर बैठ के फर्नीचर बनत देखी, त कभी हलवाई के दुकान पर बैठ के मिठाई बनत देखी। एतना ही ना, ओ समय नया-नया डिजिटल कंप्यूटर वाला फ़ोटो स्टूडियों खुलल रहे, हम ओकरा सीसा में चिपक के फ़ोटो एडिटिंग देखी। कभी कार्ड छपाई के काम देखे लागी। एक खास बात और रहे कि ई सब कुछ घण्टा ना करीं। बल्कि इतना लगन से करीं कि लोग इहाँ तक सोचे लागे कि हम उ विशेष जगह के वर्कर हई। मतलब अगर फर्नीचर बनत देखीं त लगातार 2-3 महीना फर्नीचर के ही दुकान पर रहीं। हमरा याद से हम हलवाई के दुकान पर 6-7 महीना से ज्यादा रहल बानी उहो दिन-दिन भर, दिनभर घर से बाहर रहला खातिर लात खाए के बावजूद।
           अइसन बहुत ही लंबा इतिहास बा बचपन के याद के... लिखत-लिखत हालात खराब हो जाइ। एह से अब इहें तक।

Kundan Chaudhary

हमार छोटा प्रयास बा भोजपुरी खातिर कुछ कर सकी... भोजपुरी हमार माई भाखा ह, भा माई हमरा सबसे प्यारी बाड़ी। हम सिवान के आन्दर से बानी अभी हम दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ी मल महाविद्यालय के छात्र बानी।

2 thoughts on “पुरनका याद!!!

  • October 24, 2020 at 9:37 am
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    If you want to use the photo it would also be good to check with the artist beforehand in case it is subject to copyright. Best wishes. Aaren Reggis Sela

    Reply
  • October 25, 2020 at 9:27 am
    Permalink

    If you want to use the photo it would also be good to check with the artist beforehand in case it is subject to copyright. Best wishes. Aaren Reggis Sela

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