बतकुचन : रेल सफर

माफ़ करीं काहे की हम एक महीना से ब्लॉग ना लिखत रहनिया… कारण के बात छोड़ीं आज के ब्लॉग पढ़ी भा मज़ा ली, विचार करीं, कुछ सीखीं भा अच्छा लागे त कमेंट करीं लगले हाथ शेयर भी करीं। त पढ़ीं सभे-

बात आज के ही ह…(26 March, मंगर) 12th के बोर्ड एग्जाम खतम भइला के बाद हम आपन एगो मित्र के संघे घरे खातिर निकलनिया… छपरा एक्सप्रेस के टाइम हवे 6.40 AM वाराणसी से। हम आराम से सुतल रहनिया मित्र के कॉल कईला पर 5.45 में उठ के जल्दी से तैयार भइनिया। दुनु जाना टाइम पर स्टेशन। गाड़ी 20 मिनट में आवे वाला रहल हा लेकिन 2 घण्टा लाग गइल हा भारतीय रेलगाड़ी के 20 KM के दूरी तय करे में। फिर भीड़ में कइसे भी सब सेट कर के ऊपर वाला सीट पर तिरछा-तिरछी कोना में बईठ गईनिया जा माने दुनु जाना एकवा के टारे।

यात्रा में बहुत कुछ घटल हा, सब बात लाइन-बाय-लाइन लिखेम त ब्लॉग बहुत लंबा हो जाइ… एहि से मुख्य घटना भइल हा ओकर सिर्फ सारांश ही लिखेम।

बकवास छोड़ी, कहानी अब शुरू होता…

  1. गाड़ी बनारस से छपरा के तरफ बढ़े लगलसिया… गाजीपुर के स्टेशन पर बड़ा मजेदार घटना भइल हा। हमरा पीछे वाला केबिन में मय भीड़ में एगो फैमिली भी रहल हा, छोटा परिवार- पापा, मम्मी, बेटी। प्यारी सी छोट चुलबुली (काल्पनिक नाम हरकत के हिसाब से) लईकी रहलसिया… पापा-मम्मी से ज़िद कइलसिया की हम पकौड़ी खाएम। पापा चल गइनिया बेटी खातिर पकौड़ी लियावे। पकौड़ी लेत में ही गाड़ी खुल गइल हा, हालांकि चुलबुलिया के पापा छुटलहन ना गाड़ी पर चढ़ गइल रहलहन, लेकिन आपन केबिन में ना पहुचल रहलहन। तबे मम्मी आपन बेटी से एगो सवाल कईलिय- बेटी पापा प्यारा की पकौड़ी। बेटी तनिका मायूस आवाज में कहतिया पापा प्यारा। एपर मम्मी कहलिया की त फिर पकौड़ी काहे मगइलु हा, पापा त छूट गइलन। बेटी शान्त?
    भाई हम भले कबो कुछ पढ़ी चाहे ना लेकिन सफ़र में किताब जरूर पढेनी। लेकिन ई ऊपर वाला किस्सा सुन के हमार अब किताब पर तनको ध्यान ना रहल हा। बेटी पकौड़ी खाये लगलसिया। फिर कुछ लोग माई से कहलसा की बहुत चुलबुल बिया ई, पूरा परेशान करत होइ। ई पर माई के प्यार उमड़ गइल हा भा आपन बेटी के कुछ करतूत सुनावल चालू कईलिया- आरे! ई सब त कम बा- जब कुछ नाया देखेले तुरन्त पूछी ई के ह, का ह, कइसे भइल। (बाल-मन के सवाल) दो चार गो कथा भी माई सुनाइली ह… एक बार हम हॉस्पिटल गइल रहनी त बेटी डॉक्टर के देखलस आ घरे आ के खूब डॉक्टर के बारे में पुछलस भा लास्ट में कहतिया की हमू पढ़ के डॉक्टर बनेम। एक दिन असही कहलस की हम इंजीनियर बनेम, एने से जात में कहत रहल की हम बड़ होके ट्रेन चलाएम, एकर रोज सपना चेंज होते रहेला।
    (इस पूरी घटना का संवाद मूलतः हिन्दी में घटित हुआ)
  2. तब तक फेन हम किताब पढ़े लगनी… आगे कहानी कुछ राजनीतिक बा… पूरा बोगी में ही राजनीतिक चर्चा चलत रहल हा, पूरा गरमा-गरमी के साथ। हमरा केबिन में एक आदमी बोलतारन की “बलिया में पढ़ाई संभव नइखे, अगर पढ़े के बा त घर से आगे बढ़े के पड़ी, भले बलिया इतिहास में विश्वपटल पर प्रसिद्ध बा।” तबे दोसर केहू बोलता कि “बलिया अजीब जगह पर बा जेतना भी मेन शहर बा सब कम से कम 150 km दूर बा- पटना होखे, चाहे गोरखपुर-बनारस। कवनो लइका-लईकी अप-डाउन कर के पढ़ पाई?” (सवाल सच में अच्छा बा थोड़ा बिचार करीं रउवा सभे) हमार एगो बिचार ई बा की अइसन क्षेत्र के शैक्षणिक रूप से विकास करे खातिर हमनी के युवा कुछ सामाजिक कार्य कर सकेनी जा का? हमनी के मानसिकता का बा? का ‘बलिया जइसन’ क्षेत्र के शिक्षा के केंद्र में नइखे बदलल जा सकत की कम से कम 50 km क्षेत्र के लोग इतना शिक्षा प्राप्त कर सके की ना के बराबर जरूरत पड़ो बड़ शहर जाए के।
  3. अगिला घटना एहि उपरा वाला के आगे के कड़ी ह- केबिन में उपस्थित हर उमिर के लोग 50-60 साल के बुढऊ काका तक ई बात पर सहमत बाड़न की अब लइका-लइकी में फर्क नइखे। सुन के अच्छा लागल हा बाकी पालन केतना होला ई हमरा मालूम बा। अभी भी हर जगे ई स्थिति नइखे।
  4. अब हमनी के पहुँचनीय जा बलिया… गाड़ी रुकल, लगभग पूरा खाली। अब हम भा हमार मित्र नीचे वाला बर्थ पर आ गईनिया जा। हम अभी भी किताब पढ़त रहनिया कारण ई रहल आ की उ किताब हम दीवाली वाला सफर में पढ़ल चालू कइले रहनी लेकिन पूरा ना भइल रहल अब हमरा डर रहल हा की कहीं अइसन ना होखे की आजो पूरा ना हो पावे। अब ई देख के मित्र के चिढ़ हो गइल हा, जब हम पूरा किताब पढ़ लेनिया तब मित्र कहतारन की तु हमरा के कंपनी देवे आइल रहलिया और रेलवे स्टेशन पर गाड़ी की वैट(wait) करत समय मोबाइल चलावट रहली अउर अब किताब। तु का कंपनी दे तारी हमरा इग्नोर कर तारी। पहिले माफी मँगनिय, विशाल भाई अभियो माफ़ी माँगतानी। बाकी एगो चीज़ हमरा समझ में आइल ह की अगर हम खुद साथ देवे के बात कइनी त हमरा ध्यान देवे के चाही। आज के अनुभव हमरा जिंदगी में आगे खातिर बहुत बड़का सिख बा।
  5. अंत में बात आज के किताब के
    नाम- मिस्टर B.A.
    लेखक- आर. के. नारायण
    Available on Amazon
तस्वीर आभार : Amazon

पुस्तक परिचय :-
विश्वविद्यालयी पढ़ाई के अंत-नौकरी खातिर जद्दोजहद : ई एगो अइसन लइका के जीवनलीला पर बा जे हाल ही में ग्रेजुएशन पूरा कर के थोड़ा आराम करत रहल; जवन हमनी के भी मानसिकता होला की एग्जाम के बाद आराम। एही आराम में प्यार हो जाला, ‘प्यार’ के बियाह भी हो गइल। लइका अब जोगी हो जाला लेकिन बाद में फिर ओकरा लागल की हम दुनिया से धोखा करतानी। प्रण लेहलस की हम ओकरा बियोग में केहू से बियाह ना करेम, फिर अपना-आप के संभंलस। अंत में बियाह करी की ना ई रउवा खुद पढ़ के देखी। जिन्दगी में सफल होइ की ना?

जे हमरा से जुड़ल लोग बा हमसे किताब ले के पढ़ सकेला। बाकी लोग कहीं अउर जोगाड़ लगावे।

धन्यवाद?

Kundan Chaudhary

हमार छोटा प्रयास बा भोजपुरी खातिर कुछ कर सकी... भोजपुरी हमार माई भाखा ह, भा माई हमरा सबसे प्यारी बाड़ी। हम सिवान के आन्दर से बानी अभी हम दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ी मल महाविद्यालय के छात्र बानी।

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